स्वर्ण सिन्दुर (पुर्णचन्द्रोदय) |

स्वर्ण सिन्दुर (पुर्णचन्द्रोदय) |

विधि पारद को सैंधानमक और नींबू के रस में खरल करे| फिर धोकर २० तोले शुध्द पारद २० तोले शुध्द पारद, २० तोले शुद्ध गन्धक और १ तोला सुवर्ण वर्क मिलाकर कज्जली करायें | इसकी शिशी सुबह ६ बजे चढाकर अग्नि मन्द दें| कलमीशोरा नही डालें| दूसरे दिन शाम को ७ बजे तक (अर्थात ३७ घण्टे तक) अग्नि दें| स्वांग शीतल होने पर स्वर्ण सिंदुर व सुवर्ण भस्म निकाल ले व दोनो को मिला ले.

विषेश अनुभव – कुछ रसायनों को कोयलों की भटटी पर भी बनाकर अनुभव किया | कोयलो की भटटी पर सत्वर बनते हैं किन्तु उनका गुण कुछ अंशो में अल्प होता है | जिन रसायनों को ३-३ दिन अग्नि देनी पडती है, उनके लिये लकडी की भटटी विशेष सुविधा वाली रहती है |

समगुण और व्दिगुण गन्धक जारित रससिंदूर सिंगरफ में से बनाकर निर्णय किया | रंग-रुप में किसी भी प्रकार का अन्तर नहीं पडता | इसी प्रकार से  सरलता से बन जाता है | पारद कि हानि कम होती है, समय बच जाता है | खर्च भी कम आता है | किन्तु गुणों में अन्तर होता है | जिन फार्मेसी वालों को रसायन कम मूल्य में बेचकर ग्राहकों को प्रसन्न रखना हो, उनको ये विधियां अति उपयोगी हैं |

रसायण विधि जो रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड के भीतर लिखी है, उस तरह बनाने में समय अधिक लगता है | लकडी भी अधिक जलानी पडती है, किन्तंु वह अधिक गुणदायी होता है | रसायन का पाक जितना जल्दी कराया जाता है, वह उतना ही न्यून प्रभावशाली रहेगा | जिस तरह हाथ से चलने वाली चक्की और यन्त्र से चलने वाली चक्की संे पीसे हुए आटे में अन्तर होता है, उस तरह इन रसायनों में भी अन्तर पडता है | दोनों के गुणधर्म में कितना अन्तर रहा है, यह पाश्चात्य परीक्षण विधि अनुसार कदापि अवगत नहीं हो सकेंगा | सच्चे निर्णय का साधन मात्र एक ही है की समान रोग वाले अनेक रोगीयों पर प्रयोग करके अनुभव किया जाये |

मात्रा और उपयोग – रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड में लिखे अनुसार |

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