सुवर्ण वन्ग|

सुवर्ण वन्ग|

द्रव्य – शुध्द पारद,शुध्द गन्धक,शुध्द कलई(वन्ग) और नौसादर, ये चारों १२||-१२|| तोले कलमीशोरा ६ माशे |

विधि – वन्गको कडाही में डाल अग्नि पर पिघला करके पारद मिलावें| फिर यह मिश्रण, गन्धक, नौसादर और शोरा मिलाकर कज्जली करे | इसे कपड मिटटी की हुई आतसी शिशी में भरे |उस छेद पर कुछ बडे आकार वाला अभ्रक का गोल पतरा रखे | बोतल को हांडी में रखकर बोतल की नाभि तक बालुका भरे | फिर नीचे क्रमश मन्द, मध्य तथा तीव्र अग्नि देवें | नौसादर मुंह पर लगता  जाता है, जिससे मुह बन्द होता रहता है |अतः सम्हालपूर्वक बीच-बीच में बार-बार तप्त लोह शलाका को शिशी के गले में चला-चलाकर परीक्षा करते हैं|४-५ घण्टे पर लोहशलाका की नोक पर तेजस्वी द्रव्य चिपकने लगता है| तब समझ लें की स्वर्ण वन्ग तैयार होने आई है|शलाका चलाने पर स्वर्ण वन्ग दृढ चिपके, सरलता से उपर न उठे, तब अग्नि देना बन्द कर दें| लगभग 6 घण्टों मे स्वर्ण वन्ग का पाक हो जाता है | अग्नि मन्द हो, तो ८ घण्टे लगते है |स्वांग शीतल (स्वतः ठन्डा) होने पर बोतल को विधिपूर्वक तोडकर उपर से नौसादर के पुष्प और उसके नीचे से वन्ग सिंदूर को अलग निकालें | पैंदे में सुन्दर गिनीगोल्ड के समान तेजस्वी स्वर्ण वनग मिलती है, असे उलग रखें |

मात्रा और गुणधर्म – रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड में लिखे अनुसार |

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