सुवर्ण भस्म

द्रव्य – शुध्द स्वर्ण वर्क ४ तोले,श्वेत मल्ल ४ तोले |

प्रथम विधि– दोनों को मिला, तुलसी, वन तुलसी अथवा कुकरौंधे के रस में ७ दिन खरलकर टिकिया बनावें | फिर सूर्य के ताप में सुखा,शराव सम्पुट कर १ सेर कण्डों की अग्नि देंवे | स्वान्गंशीतल होने तर निकाल,१ तोले सोमल मिला पुनः १२ घण्टो उसी के स्वरस में खरल कर टिकीया बना शराव सम्पुट कर कुक्कुट पुट देवें | इस तरह ७ या अधिक समय १-१ तोला सोमल मिला- मिलाकर अग्नि देवें | सुवर्ण की चमक बिल्कुल नश्ट हो जाने पर बिना सोमल मिलाये १२ घण्टें उसी के स्वरस में खरल करके कुक्कुट पुट देवें पष्चात गुलाब जल, कमल के फूलों कें रस तथा मौलसरी (बकूल) के फुलों के स्वरस का एक-एक पुट देने से मुलायम, लाल-गुलाबी रंग की भस्म बन जाती है | वनज लगभग ६ तोले होता है, इस विधि का मूल आधार हमें गुजराती रसायन संग्र्रह से मिला है| अतः हम उनके आभारी है |

मात्रा – १/८ से १/४ रत्ती, दिन मे दो बार, रोगानुसार अनुपान के साथ देवें |

उपयोग – सुवर्ण भस्म का उपयोग रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड के भस्म प्रकरण में विस्ताापूर्वक दर्षाया है | वनौशधि से मारित सुवर्ण भस्म की अपेक्षा यह भस्म उग्र मानी जायेगी | क्योंकी इसमें मल्ल भस्म  का रासायनिक योग हुआ है वाताक्षेजनित विकारों एवं सन्निपातपर कहे हुए प्रयोगों – योगेन्द्र रस बृहद वातचिन्तामणि रसराज रस हेमगर्भपोटली आदि में वनौशधिमारित  भस्म की अपेक्षा मल्लमारित भस्म मिलाने से योग आशुफलप्रद बनता है |

इस तरह कतिपय आचार्यों के मत  के अनुसार राजयक्ष्मा की व्दितीयावस्था और तृतीयावस्था में उपयोग में लेने के लिये मृगान्करस राजमृगान्ग रत्नगर्भपोटलीरस हेमगर्भपोटली आदि मे इस भस्म को मिलाना विशेष हितकारक माना जायेगा |

मल्ल मिलाये बिना सुवर्ण के वर्क को वनतुलसी के रस से 10 – 12 पुट देकर भी हमने अनेेक बार सुवर्ण भस्म बनायी है | वह अच्छी मुलायम बन जाती है हम विषेशतः तनस्पतिमारित भस्म का ही प्रयोग करते रहते है |

की प्रथमावस्था में जिस स्थान पर षीतल और शामक औशधि देनी हो वहा पर इस मल्लमारित भस्म का उपयोग नहीं कराना चाहिये |

इस मल्लमारित भस्म को यथा विधि अमृतीकरण करके व्यवहार में लाना विशेष हितावह माना जायेगां |

दूसरी विधी – शुध्द सुवर्ण वर्क अथवा बारीक बुरादा १ तोला कुक्कुटाण्डत्वक मुर्गी के अंडो के वे छिलके जिनमें से स्वाभाविक बच्चे पैदा हुए हों 2 तोले लें दोनांे को खरल में डाल हुल-हुल के स्वरस से 1 दिन निरन्तर घोट कर टिकिया बना सुखाकर कुक्कुट पुट दें स्वांग शीतलहोने परपूर्ववत हुल-हुल के रस में घोटकर 5 बार कुक्कुट पुट देने से गुलाबी रंग कि मुलायम भस्म हो जाती है |

मात्रा और गुणधर्म – रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड में लिखे अनुसार यह भस्म श्रेश्ठ रसायन हदय और मस्तिश्क पोशक है राजयक्ष्मा में तथा वातवाहिनियों की  और मांसपेशीयों की निर्बलता को नश्टकर पुंसत्व प्रदान करने में उत्तम है |

यह भस्म शुक्रक्षय अस्थिक्षय प्रबल ज्वर आदि  रोगों की निवृती होने पर रही हुई निर्बलता पक्षाघात और कम्प आदि वातरोंगो से पीडीत प्रसुता सगर्भा और वृध्द इन सबको शक्ति प्रदान करने के लिए इस विधि से बनी हुई सुवर्ण भस्म विशेष लाभ पहुचाती है |

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