वअंगाष्टक भस्म

वअंगाष्टक भस्म

द्रव्य-

शुध्द पारद षुध्द गन्धक लोहभस्म रौप्यभस्म शुध्द खपरिया या जसद भस्म अभ्रक भस्म ताम्रभस्म ये 7 औषधियाॅं 4 – 4 तोले और वअंगभस्म 28 तोले लें |

विधि –

पहले पारद-गन्धक की कज्जली करें | फिर सब औषधियांे को मिला त्रिफला और गिलोय के क्वाथ में 3 दिन खरल कर 2-2 तोले की टिकीया बना 4 शरावों में दृढ संपुट कर पृथक -पृथक लघु गजपुट व्दारा अग्नि देवें|

वक्तव्य –

आचार्यो ने भस्म को 1 पूट देने का विधान लिखा है | किन्तु हम  पुट देते है 3 पुट देने से भस्म मुलायम और विशेष गुणकारी बनती है|

मात्रा-

2-2 रत्ती देने से 2 बार शहद के साथ दे | उपर हल्दी का चूर्ण 1 माशा और षहद 6 माशे मिलाया हुआ आंवलो का रस या फाण्ट पिलावें |

उपयोग –

यह भस्म बातकफप्रधान प्रकृति के लिये विशेष उपकारक है | अनेक प्रमेह आमदोष विसूचिका विषमज्वर गुल्म अर्श मूत्रातिसार और पित्तवृध्दि को दुर करती है वीर्य की वृध्दि करती है | प्रदर तथा सोमरोग को नष्ट करती है | स्त्री रोगांे के लिये यह उत्तम औषधि है |

वंग भस्म के साथ इतर भस्मंे मिल जाने से प्रजनन तन्त्र मुत्रतन्त्र पचनेन्द्रिय संस्थान रससंस्थान रक्त-मांस-वातसंस्थान फुफफुसांे आदि पर लाभ पहुंॅचाता है | इस प्रयोग में ताम्रभस्म होने से मुत्रतन्त्र और पचनेन्द्रिय संस्थान पर उग्रता प्रतीत हो तो मात्रा कम करनी चाहिये |और उस समय दूध नही लेना चाहिये अन्यथा उबाक आती है |

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