लोह भस्म

लोह भस्म

विधि –

शुध्द लोह चूर्ण आध सेर को एक चीनी मिटटी के पात्र में भर उपर १ सेर तक पक्के तरबूज का रस डालकर किसी एकान्त स्थान में रख दें | पात्र को ऐसे स्थान पर रखना चाहिये जिससे दिन या रात्रि को उठाने की जरुरत न रहे धुप लगती रहे | लगभग १ मास होने पर पीली मिटटी के सदृश भस्म बन जायेंगी, फिर इसको ३ दिन तक घीकुंवार के रस में खरलकर २-२ तोले की टिकिया बना सुर्य के ताप में सुखावें, फिर छोटी हांडी में बन्द कर मुखमुद्रा कर गजपुट में फुंक देवे इस तरह ३ गजपुट देने से लाल रंग की मुलायम भस्म बन जाती है |

वक्तव्य –

यदि घीकुंवार के रस में ५ – ५तोले सिंगरफ मिलाते रहे तो भस्म विशेष लाभदायक बनती है किन्तु रंग काला हो जाता है इसे जामुन की छाल के क्वाथ के ७पुट देने पर वर्ण नीलाभ हो जाता है यह भस्म मधुमेही को विशेष लाभ पहुंचाती है |

मात्रा–1 सत 2 रत्ती दिन, में दो बार रोगानुसार अनुपान भेद से देवें |

उपयोग–यह भस्म रक्तवर्धक  और पान्डूनाशक एव शोथहर है | कब्ज नही करती और क्षुधा को

बढाती है | विशेष गुण रसतन्त्रसार व सिद्ध प्रयोग संग्रह प्रथम खंड के भस्म – प्रकरण में

लिखे है |

 

लोहभस्म अमृतीकरण –

लोहभस्म के समान भाग गोघृत मिला लोहे की काढाही में डाल, चूल्हें पर चढावें | नीचे मन्द अग्नि देवें, फिर कुछ तेज करें घी जीर्ण हो जाने,पर अग्नि देना बंद करें स्वांग शीतल होने पर कडाही को उतार लेवें | इस भस्म की सर्व योगों में योजना करनी चाहिये, इस प्रकार अमृतीकरण करने से गुणों मे वृध्दि होती है | और यह भस्म वारितर भी होने लगती है |

 

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