मल्ल सिन्दुर

द्रव्य – शुध्द पारद २० तोले,शुध्द गन्धक १५ तोले और शुध्द सोमल ५ तोले |

विधि – तीनों को मिलाकर कज्जली करें | उसे कपड मिटटी की हुई शराब २६ औस  कि लाल बोतल में भरकर बालुका  यंत्र  में रखे | प्रारम्भ में ३ घण्टे अग्नि को तेज दे, फिर काम करे ३-४ घंटे बाद  तपायी हुई लोह शलाका डालकर औषधि को चलावें | उस समय बोतल में द्रव्य किचड जैसा हो जाने का भास होता है| जब धुवां नली से निकलना बन्द हो, तब लोह शलाका को करीब ५-५ मिनट पर चलाना चाहिये, बोतल को नली को नही रगडना चाहिये | ४-५ घण्टों में गन्धक नली मे ज्यादा लग जाये, तब अग्नि केवल एक लकडी की रखें और थोडा-थोडा कलमीशोरा डालते जायें | ३-४ समय मे करीब ४-६ माशे शोरा डालना पडेंगा | लगभग १० घण्टो में सब गन्धक का जारण हो जाता है| गन्धक जब बहुत कम रहता है, तब वह जल्दी-जल्दी उठ-उठकर डाट बनने लग जाता है | डाट आ जाने पर करीब १० घण्टों के पष्चात (गन्धक जारण हो जाये तब)शलाका चलाना  बन्द करें |     १ घण्टा ठहरकर अग्नि कुछ तेज करें | फिर २ घण्टें होने पर अग्नि देना बिल्कुल बन्द करें | इस तरह यह रसायन १२ घण्टे मे तैयार होता है |  अग्नी मंद देणे  १५-१६ घंटे लगते है |स्वांग शीतल  (स्वत: ठन्डा) होने पर बोतल की नली में गन्धक के नीचे लगा हुआ मल्ल सिन्दूर निकाल लेवें |

 

मात्रा व उपयोग– रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड में लिखे अनुसार |

वक्तव्य – उपर काही विधि के अनुसार मल्ल चन्द्रोदय, तालचन्द्रोदय, तालसिंदूर, व्याधिहरण रस,शिलासिंदुर, समीरपन्नग, सुवर्णभूपती, पत्र्जसुत आदी रस भी तैयार कारायें है | शिलासिंदुर, समीरपन्नगमें मैनसिल होने से कलमीशोरा डालने की विशेष आवश्यकता नहीं मानी जाती |२० तोलें रस सिन्दुर समगुण गन्धक जारित में भी  कलमीशोरा १||-१|| माशे दो बार डाला गया | रस सिन्दुर का डाट १३ घण्टो बाद  आने लगा | फिर ३ घण्टे बाद अग्नि देना बन्द किया | प्रयोगार्थ सिंगरफ में से भी रससिंदुर बनाया गया|२५ तोले सिंगरफ में ५ तोले गन्धक मिलाया शिशी५ बजे सुबह चढायी| दोपहर को ३ बजे से डाट आना प्रारम्भ हुआ | शाम को ७ बजे शिशी उतार ली |

समीरपन्नग(नं.२)में मैनसिल न होने से वह सरलता से बनता है | तल में कुछ भी शेष नही रहता |  पहले प्रकार में मैनसिल होने से मैनसिलयुक्त पतली तह कुछ पीले रन्ग की अलग भी हो जाती है जो साधकों को भ्रम में डाल देती है |

 

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