प्रवाल भस्म

प्रवाल भस्म

 प्रथम विधि –

प्रवाल शाखा २० तोले  को १ सेर गोमूत्र में डालकर मन्दाग्नि पर उबालें गोमूत्र चतुर्थांश शेष रहने पर हांडी को नीचे उतार लेवें | शीतल होने पर प्रवाल को जल से धो नींबू के रस में ३ दिन तक डुबो देवें| चौथे दिन प्रवाल को जल से धो लेने पर उपर से सफेद हो जाती है | पश्चात उसे शराव सम्पुट में बन्द मर लघु पुट देवें | स्वांग शीतल होने पर निकाल घी-कुंवार के रस में १२ घण्टे ख्रलकर २-२ तोले की टिकीया बनाकर सूर्य के तेज ताप में सुखांवे फिर शराव सम्पुट का गजपुट मेु फुंक देने से मुलायम श्वेत भस्म बन जाती है | इस भस्म को जिल्हा पर डालने से खारापन नहीं जाना जाता जिल्हा भी नही फटती |

मात्रा –

१ से ४ रत्ती दिन में २ से ३ बार रोगानुसार अनुपान के साथ देवें |

उपयोग –

यह भस्म ज्वरों में दोष पाचन के लिये अति हितावह है कब्ज हो तो उसे भी दूर करती है |

विशेष गुण रसतन्त्रसार व विध्दप्रयोगसंग्रह प्रथम खण्ड में प्रवाल भस्म पहली और तीसरी विधि के साथ दिये है |

व्दितीय विधि –

४० तोले प्रवालषाखा को कूटकर चूर्ण करें | फिर बोतल में डाल उपर नींबू का रस भरे नींबू का रस प्रवाल के उपर ३-४ अंगुल रहना रस कम होने, पर और मिलाते रहें | उन्त में रस को सुखाकर प्रवाल को खरल में घोट लें | इस तरह से लगभग २१ दिन में मुलायम सूर्यपुटी प्रवाल भस्म बन जाती है |

गुणधर्म –

उपर की विधि के अनुसार |

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