अष्टामृत भस्म

अष्टामृत भस्म

द्रव्य –

शुध्द कासीस शुध्द मनःषिला शुध्द गोन्दती शुध्द प्रवाल मूल शुध्द  मोती की सीप शुध्द स्वर्णमाक्षिक षुध्द रौप्यमाक्षिक और धान्याभ्रक 5-5 तोले |

विधि-

8 औषधियों को मिलाकर अर्क दुग्ध में 3 दिन खरल करे | फिर 2-2 तोले की टिकीया बना सुर्य के ताप मे सुखा शराव सम्पुट कर गजपूट व्दारा अग्नि देवें स्वाअंग शीतल होने पर निकाल पुनः 3 दिन अर्क दुग्ध में मर्दन कर गजपुट देवंे इस तरह 3 पुट देवें| फिर घीकुंवार के स्वरस में 1-1 दिन घोटकर 7 पुट देने से श्वेत धुसर वर्ण की मुलायम भस्म बन जाती है |

मात्रा –

1/2 से 4 रत्ती दिन में 2 बाद शहद घृत मिश्री शर्बत वनस्पा से अथवा रोगानुसार निम्न अनुपात के साथ देवें |

  1. यकृत्प्लीहावृध्दि – हरडमिश्रीत कुमार्यासव
  2. जीर्ण प्रतिश्याय – श्लेष्मा के निस्मरणार्थ मिश्री
  3. शुष्क कास – शर्बत बनप्सा शहद-घृत अथवा चन्द्रामृत रस के साथ
  4. शिरदर्द – त्रिफला या हरड के साथ देवें | और उपर दुध पिलावें |
  5. आघातज शुल – मिश्री के साथ देवें| और उपर गुनगुना जल पिलावें |
  6. मंथर ज्वर – कास प्रकोप हो तो शहद के साथ
  7. बच्चों की कालीी खाॅंसी – आधा रत्ती शहद या माता के दूध के साथ

उपयोग –

अष्टामृत भस्म शामक प्रदाहहर और कफश्न है नुतन प्रतिश्यायज कास प्रतिश्यायसह गलौघ श्वासनलिका प्रदाह उरस्तोय प्ल्युरिसी अपचन और प्रतिश्याय से होने वाली जलन फुफफुसों में प्रदाह जनित पतला श्लेष्मा भर जाना फुफफुसों का जकड जाना तेजवायु शीत या सुर्य के ताप के आघात से सांधो-सांधो में अकडाहट और शरीर अकड जाना शुष्क कास शिरदर्द तथा यकृत्प्लीहावृध्दि होकर शुष्क कास चलना आदि विकारों को नष्ट करती है |

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