अमृतार्णव रस ज्वर

द्रव्य – शुध्द बच्छनाभ शुध्द पारद शुध्द गन्धक लोह भस्म और अभ्रक भस्म  5-5 तोला |

विधि –

सब को मिलाकर चित्रकमूल के क्वाथ कि 7 भावनांये देकर 1-1 रत्ती की गोलियां बना लेवें |

मात्रा –

1 से 3 गोली दिन में 2 बार निवाये जल कण्टकार्यादि क्वाथ नागरादि पाचन या सुदर्शन  चूर्ण के अर्क के साथ देवें |

उपयोग –

यह रस आमाशकयिक विकार सह विषमज्वर को दूर करता है आमाशय में दोष प्रकोप होकर उस स्थान की पचन-क्रिया बिगडती है फिर वहां पर आमसत्र्चय होकरं ज्वर की उत्पत्ति होती है  |इसी हेतु से आयुर्वेद ने ज्वर चिकित्सा में दोषांे को पचन कराने औषधियों का उपयोग प्रधानता से किया है | इस रस में चित्रकमूल के क्वाथ की 7 भावनांये देने का रहस्य भी यही है आमाशय में दोषसत्र्च होने का निमित्त कारण जिस तरह हुआ है उसका विचार औषध-योजना करने पर अवश्य करना पडता है | एवं आमाशय के दोष से केवल ज्वर ही उत्पन्न होता है ऐसा नहीं दोष दूष्य के संयोग से इतर व्याधि भी उत्पन्न हो सकती है |इस दृष्टी से औषधि के गुणधर्म का विचार करना चाहिये |

विवेचन –

केवल सामदोष से अग्निमान्दय उत्पन्न होकर ज्वरोत्पत्ति होने, पर त्रिभुवन कीर्ती आनन्द भैरव आदि औषधियोंका उपयोग होता है किन्तु सामदोषज अग्निमान्दय का निमित्त कारण मनोव्याघात अतिशय मानसिक श्रम काम शोक भय आदि का अतियोग श्रम और उसी के हेतु से उन दोनों से उत्पन्न रोंगो में भी स्पष्ट रुप से प्रतीत होगा ही धातुवैषम्य को दूर करने के समय इन अन्तर की ओर अवश्य लक्ष्य देना पडता है |

मिथ्या आहार से उत्पन्न हुई धातुवैषमय प्रवृत्ति स्थूल रुप की होती है | और मनोव्याघातज धातुवैषम्य प्रवृत्ति सुक्ष्म स्वरुप की होती है | इस हेतु से इसका परिणाम पहले मन पर होकर फिर शरीर पर प्रकट होता है तथा मिथ्या आहारजन्य वैषम्य में स्थूल षरीर के अवयवों में दोष संगृहित होता है इस तरह शास्त्रीय संप्राती की दृष्टि से इन दोनों मे यह अन्तर है चिकित्सा करने में इस उत्पत्ति की ओर दुर्लक्ष्य नही करना चाहीये |

इस अमृतार्णव रस में अभ्रक और लोह इन दोनों का कार्य मनोव्याघात जन्य दोषदुष्टि को नष्ट कर धातुसाम्य-प्रवृत्ति स्थापित करना है | इस हेतु से कामज्वर भय या षोक से उत्पन्न ज्वरांे पर यह रस ब्राम्ही अर्क पित्तपापडा सारिवादि क्वाथ या सारस्वतारिष्ट आदि अनुपान के साथ दिया जाता है | ज्वर वेग तीव्र होने पर इस रस के सेवन-काल में अन्तर पर 1 – 2 घण्टे या पश्चात प्रवाल पिष्टी मौक्तिक पिष्टी और गिलोयसत्व को मिलाकर देना चाहिये |

विषम ज्वर में दोषों का प्रसार भिन्न-भिन्न दूष्यों में होता है | और दोष-दूष्यों का यह संयोग भिन्न-भिन्न प्रकार के निमित्त कारणांे से होता है | जितना दोषदुष्य का संयोग तीव्र हो उतना ही रोग तीव्र होता है | इस प्रकार के तीव्रप्रकोपकाल में महाज्वरांकुश नारायण ज्वरांकुश मृत्युत्र्ज रस आदि औषधियां विशेष उपयोगी होती है| इन सब रसों में स्थुल प्रकोप  को नष्ट करने का गुण है किन्तु  धातुओं मे लीन दोषों का प्रषामन करने की सामथ्र्य नही है |यह महत्व का कार्य अमृतार्ण रस कर सकता है विषमज्वर जितना जीर्ण हो उसके साथ प्लीहावृध्दि सर्वान्डग में पाण्डुता बलहानि आदि उपद्रव्य अधिक रुप में हों उतना ही अमृतार्णव का उपयोग अधिक होता है |

आमाशय के दोष से उत्पन्न होने वाले छोटे बच्चों के और बडे पनुष्यों के रोगों में अमृतार्णव अच्छा कार्य करता है | छोटे बच्चों के क्षीरालसक और पारिगर्भिक विकारों में करणभेद और अवस्था भेद से आमाशयदोष ही कारण होता है |

क्षीरालसक में आमाशयस्थ कफ बढकर पक्वाशय और बृहदन्त्र में पचन – व्यापार की विकृति होकर रसरक्तवाही स्त्रोत रुध्द होते है फिर उसी हेतु से शिशु क्षीण हो जाता है | उस विकार में शिशु का ज्वर बढ जाता है हाथ-पैर कृश होते है | मस्तिष्क बडा हो जाता है | बार-बार मुॅंह से पानी निकलता है कभी कोष्ठबध्दता तथा कभी अपक्व और श्लेष्म-मिश्रित पतला दस्त होता है इस व्याधि में अमृतार्णव का अच्छा उपयोग होता है |

पारिगर्भिक विकार में सगर्भा माता के दूध से अधिक स्निगधता गुरुता और विकृति होने से उसका योग्य पचन नहीं होता इस हेतु से आमाशयस्थ कफ दोष की वृध्दि होती है यह विकृति माता की सगर्भावस्था के हेतु से होती है | इसमें भी विशेषतः क्षीरालसक के समान लक्षण होते है | इसके अतिरीक्त आमाशय विकृति के हेतु से बालक सारे दिन रोता ही रहता है | किसी भी स्थिती में उसे चैन नही पडता मस्तिष्क और गाल शुष्क से भासते  रहता है क्षुधा संदिग्ध उदर में भारीपन अति थकावट बार-बार हरे दस्त और उदास एवं निस्तेज मुखमण्डल आदि लक्षण प्रतीत होते है |ऐसी परिस्थिती में पहले वमन बचप्रधान औषधि देकर आमाशय का संशोधन करना चाहिये फिर अमृतार्णव रस देना चाहिये |

आमाशयस्थ विकार से बालकांे को बालग्रह रोग उपस्थित होता है | इस विकार में कुंछ अंश में विकृत हो जाने पर या माता के अतिरीक्त गोदुग्ध आदि सेवन होता हो तो  उसकी सम्हाल न रखने से उसमे विकृति हो जाती है | फिर उसके सेवन से आमाशय में कफ दुष्टी होती है | पश्चात सम्पूर्ण कोष्ठ बिगडकर उस स्थान की दोषविकृति होकर बालक को बालग्रह धनुर्वात के आक्षेप आने लगते है | पक्वाशय यह वातस्थान होने से उस स्थान में वात-विकृति होती है उदर में वेदना अफारा ज्वर मलावरोध या बार-बार दुर्गन्धयुक्त काला-सा योग्य रचना रहित थोडा-थोडा दस्त होते रहना बार-बार आक्षेप दौरा आना आक्षेप तीव्र वेगपूर्वक आना प्रत्येक दौरे के साथ बालक की शक्ति का हास होना आदि लक्षण होते है |

इस विकार पर या उस स्थिती में लक्ष्मीनारायण रस के समान अमृतार्णव रस का उपयोग होता है |

शिशु के किटाणुजन्य अतिसार मंे दुग्धविकृति ही कारण होती है | ग्रीष्मऋतु में दूध जल्दी खराब हो जाता है ऐसा खराब दूध बच्चे को पिला देने से अतिसार हो जाता है| इस विकार की तीव्रावस्था मंे एरण्ड तैल दुर्जलजेता रस या सर्वागसुन्दर रस प्रयुक्त होता है | किन्तु तीव्रावस्था का वेग मन्द होने पर या तीव्रवस्था में वातप्रधान लक्षण अधिक प्रबल होने पर अर्थात बच्चे को धनुर्वात के आक्षेप कम्प अपतानक आदि विकार उपस्ािित होने पर ओर साथ-साथ ज्वर ग्लानि और षक्तिपात होने पर अमृतार्णव रस का उपयोग किया जाता है |

बडे मनुष्य को अपचन और फिर बध्दकोष्ठ ये विकार आमाशय की कफदुष्टि से उत्पन्न होते है इस विकार में अग्निमान्दय मुॅंह में बार-बार मीठा जल आते रहना उदर में भारीपन भोजन की इच्छा कम रहना अरुचि और विशेषतः स्निग्ध और भारी अन्न की चाह न होना आदि लक्षण होने पर और उसके साथ बल का हास होने पर   और उसके साथ बल का हास होने पर  अमृतार्णव रस का अच्छा उपयोग हुआ है |

इस प्रकार आमाशय विकृति के हेतु से आमाशय में कफ की वृध्दि होकर बार-बार तमक ष्वास का दौरा होता रहता है | इस विकार में कफप्रधान विकृति के हेतू से महाप्राचीरा पेशी पर दबाव पडने से तमक श्वास उत्पन्न होता है इस स्थिती में आरोग्यवर्धिनी और अमृतार्णव दोनांे औषधियां  उपयोगी है |

पक्वाथय और बृहदन्त्र में मलसन्न्ज अधिक होने और वातदोष का प्रधान कोने पर आरोग्यवर्धिनी देनी चाहिये, विकार केवल आमाशय  में ही हो और कफ की प्रधानता हो तो अमृतार्णव का उपयोग होती है तीव्र वेग के समय दोषदूष्यादि के विचार से श्वासकुठार समीरपन्नग रसकर्पूर या सोम का फाण्ट आदि वातघ्न और श्वासहर औषधियों को प्रयोजित करनी चाहिए |

इस औषध मंे कज्जली जन्तुघ्न योगवाही रसायन विकासी ओर व्यवायी गुणों वाली है इसके गुणधर्म के हेतु से श्लेष्मदुष्टि नष्ट होकर धातुसाम्य स्थापित होता है अभ्रक भस्म और लोह भस्म का कार्य रसायन आदि गुणों के हेतु से अत्यन्त सूक्ष्म परमाणु पर्यन्त पहुॅंच जाता है | अभ्रक भस्म में वातवाहिनियों और वातवह केन्द्र को षक्तिदायक और  शामक गुण है एवं लोह भस्म में रक्त को सबल बनाकर सारे षरीर के बल को बढाणें का गुण होता है बच्छनाभ ज्वरहर वेदनाशामक और वात के आवेग को दमन करने वाला है, बच्छनाग को गोमत्र में शुध्द करके मिलाने, से वह हदय कि शक्ति क्षीण नही करता चित्रकमूल में अग्निप्रदिपक पाचक और आमाशयस्थ कफदोष की विषमता को नष्ट करना तथा लघु अन्त्र और बृहदन्त्र मंे से  वात-दुष्टि को दूर करना ये गुण अवस्थित है |

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