विधि

शुध्द सुवर्ण के पतरों के छोटे-छोटे टुकडो को पक्के बीकर या फलास्क में डाले हुए अम्लराज ( ३ भाग नमक का अम्ल और 1 भाग शोरे का अम्ल को मिलाने पर अम्लराज बनता है | दोनों प्रकार के तेजाब जल रहित शुध्द लेना चाहिये) में डालकर ३-४ दिन तक रहने देवें जिससे सब सोना गल जायेगा और अम्ल की गन्ध दूर हो जायेगी अम्लराज उतना लें, जितने में सुवर्ण गल जाये आधिक अम्ल मिलाया जायेगा, तो फिर तपाकर अम्ल को उडाने में अधिक समय लगेगां | यदि अम्ल कम मिलाया जायेगा तो सुवर्ण पुरा नही घुलेंगा सुवर्ण जो न घुला हो उसे निकाल कर दुसरे पात्र में अम्लराज में मिला लेवें फिर स्पिरिट लेम्प  या घासलेट के चूल्हे या कोयले की अंगीठी पर रखी कडाही में रेता बिछावें | उस रेत पर कांच के बीकर के भीतर उक्त स्वर्ण मिश्रण रखकर अति मन्द अग्नि देवें | अम्ल का सब अंश उड जाने पर चमक रहित पीली राख जैसा सोना देखने में आयेंगा, उसे स्वांग शीतल होने देवे |

 

सामान्यतः १० तोले सुवर्ण को हम ३० औंस अम्लराज में मिलाते है | सुवर्ण १||-२ दिन में गल जाता है, किन्तू हम 1 सप्ताह तक असे रहने देते है | फिर बत्ती वाले स्टोव पर उसी बीकर को चढाते है | अहोरात्र मन्द अग्नि देकर ३-४ दिन मे पचन कराते है | अम्ल उड जाने पर पहले सुवर्ण का रंग श्याम प्रतीत होता है | फिर ८ से १२ घण्टे अग्नि देने पर रंग पीली मिटटी समान बन जाता है | उसे स्वांग शीतल होने देते है फिर उस स्वर्णराज में ऑक्जेलिक एसिड का १०% का ( Solution) घोल बहुत धीरे-धीरे डालते रहें | यह जल उतना पिलावे कि वह वर्णहीन (Colourless) हो जाये ताम्र मिश्रित होगा तो हरा रंग हो जायेगा वर्णहिन होने पर फिल्टर पेपर से छान लें | फीर २-३ बार जल मिला छानकर ऑक्जेलिक एसिड को बिल्कूल निकाल डालें |

सूचना –

  • सुवर्ण गल जाने पर भी अम्ल में बाष्प (Fumes) उडती रहे तब तक अग्नि पर नही चढाना

चाहिये | अन्यथा रज मुलायम नही बनती |

  • सुवर्णराज बनाने पर तेज अग्नि देने पर रज जल्दी बन जाती है किन्तुं अम्ल के साथ कुछ

सुवर्ण भी उड जाता है | जिससे वनज कम को जाता है एवं रज में मोटे कण रह जाता है |

  • अम्ल का क्षार रह जाने पर (रज का श्याम रंग रह जाने पर) अग्नि देना बन्द कर दिया जायेगा

तो सुवर्ण रज अम्ल क्षार युक्त हो जायेगी |

  • कभी – कभी फिल्टर पेपर से वाश्पजल छानने पर कुछ सोना भी नीचे चला जाता है जो जल से पृथक नही होता | ऐसे ज लमे कुछ फिटकरी डाल कर २-४ घन्टे अग्नि देते है | जिससे सुवर्ण वर्क सदृश पृथक हो जाता है| कभी दुसरी बार फिल्टर पेपर से छानने से ही सुवर्ण उपर रह जाता है|

 

  • ऑक्जेलिक एसिड डालने के पष्चात यदि घोल का रंग पीला हो जाये, तो उसमें अम्ल राज रह गया है ऐसा मानकर पुनः उसे गरमकर उडा दे |
  • ऑक्जेलिक एसिड मिलाने से लोह आदि अंश जो मिश्रित हो, सब नष्ट हो जाता है, किन्तु

ऑक्जेलिक विष होने से स्वर्ण चूर्ण को २-३ बार वाष्पजल से अच्छी तरह धोकर निकाल डालना चाहिये |

  • सुवर्ण चुर्ण में मिश्रित जल दोहरे फिल्टर पेपर से छानने पर जो निकले वह सब इकटठा करें| फेंक न देवें | ४-६ दिन पडा रहने पर ऑक्जेलिक अम्ल के संयोग से पानी में घुला हुआ सोना पृथक होकर तले में बैठ जाता है |

आखिरी दिन  हम उसमें थोडा फिटकरी का चुर्ण भी मिलाते है | जिससे कुछ शेष रहा हो तो

वह भी तलस्थ हो जाता है |

यह पावडर एक प्रकार की विशुध्द स्वर्ण भस्म है | इसमें तेजाब का कुछ भी अंश नही रहता इसका प्रयोग वर्क के स्थान पर हम करते रहते है | बाजार से लाया हुआ वर्क या बनाया हुआ वर्क भी कुछ इतर धातु के मिश्रण बाला होता है |

यदि वर्क बनाने वाले ने गडबडी की हो तो औशधि अति न्यून गुणवाली बन जाती है| वर्क वनज में कुछ कम आ जाता है तब आर्थिक हानि भी पहुचति है | इसके अतिरिक्त यह पावडर वर्क की अपेक्षा रक्त मे सत्वर शोषित हो जाता है | और पुरा-पुरा लाभ पहुंचाता है| भस्म बनाने में भी हम इस पावडर को ही उपयोग में लेते हैं |

उपयोग

जो रोगी वर्क का सेवन करते है उनको इस पावडर का सेवन कराना विशेष लाभप्रद है | क्षय रोग की प्रथमावस्था में १ माषा स्वर्ण,२माशा मुक्ता पिश्ठी,४ माशे प्रवाल पिष्टी,५ माशे भीमसेनी कपूर १ तोला गोदन्ती भस्म और ८ तोला सितोपलादि चूर्ण मिलाकर खरल कर लेवें | इसकी १-१माशेमात्रा देने से १/१५ रत्ती सुवर्ण और १/३ रत्ती शहद के साथ देते रहने | और उपर ३-३माशेसुदर्शन चूर्ण का फाण्ट पिलाते रहने से थोडे ही दिनों में शुष्क कास और ज्वर सह राजयक्ष्मा दूर हो जाता है | विशेष उपयोग स्वर्णभस्म (रसतन्त्रसार प्रथम खण्ड) में देखें |

 

Follow by Email
Facebook
Facebook
Twitter
Visit Us
LinkedIn
Google+
Google+
http://parijatak.com/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c/
Instagram