नाग भस्म

नाग भस्म

प्रथम विधि-

२ सेर शुध्द सीसे को कडाही में डाल तीक्ष्ण अग्नि पर रख बड या पलाश के डण्डे से घोटकर भस्म करें| फिर छान घीकुंवार के रस में खरल  कर २-२ तोले कि टिकीया बनाकर २-२ सेर कण्डों की अग्नि में फुंक देवें |

यह सीसा ४० पुट तक सजीव हो जाता है इसे स्वांग शीतल होने पर खोलकर निकाल लेवें| और बार-बार पुट देते रहें ४० पुट हो जाने के पष्चात कण्डों की मात्रा बढावें अन्त में १० गजपुट देवें| इस तरह १०० पुट देने पर मुलायम उत्तम भस्म बन जाती है|

मात्रा-

आधा से १ रत्ती दिन में २ बार मक्खन के साथ १० दिन तक देवें|

फिर १० दिन बन्द करें पुनः १० दिन देवें|

उपयोग-

यह भस्म उत्तम रसायनरुप है शास्त्रीय फल नागस्तू नागशततुल्यबलं ददाति की सार्थकता इस भस्म में प्रतीत होती है | मधुमेह के रोगी के लिए यह भस्म आर्शीवाद के समान है | इसके उतिरिक्त वृध्दावस्था दिर्घकाल पर्यन्त रोग रह जाने से प्राप्त शारीरीक निर्बलता क्षय उरःक्षत शुक्र की निर्बलता स्मृतिहास अकाल में वलीपलित की प्राप्ती नपुसंकता आदि को यह भस्म दूर करती है | विशेष गुणविवेचन रसतन्त्रसार व विध्दप्रयोंगसह प्रथम खण्ड में है |

व्दितीय विधि-

२ सेर शुध्द सीसे को मिटटी के पात्र में डालं चूल्हे पर चढां तीव्राग्नि देवें, और आक के मूल के डण्डे से चलाते रहें, यह सिन्दूर सदृष्य लाल भस्म होती है उसे छान घीकुंवार के रस में खरल कर १-१ सेर के पेडे बना सुखा मिटटी के शराव में रख मुंॅह पर कपड  मिटटी करे फिर बाटी की तरह सेंके |

तृतीय विधि-

१ सेर शुध्द सीसे को लोहे की कडाही में डाल अग्निपर द्रव करें | उसमें इमली और पीपल वृक्ष की छान का जौकूट चूर्ण थोडा-थोडा डालते जायें, और लोहे की कडछी से चलाते वृक्ष की छाल का जौकूट  चूर्ण डालने पर सीसे की लाल रंग की भस्म हो जाती है | पश्चात भस्म को तवे से ढक दे | और तीन घन्टे तक अग्नि देते | रहें स्वांग शीतल  होने पर कपडे से छान लेवें | फिर १२ वा हिस्सा मैनसिल मिला अडसे के पत्तों के स्वरस में ६ घण्टे तक खरलकर छोटी-छोटी टिकिया बना सम्पुट में बन्द कर २ सेर कण्डों की अग्नि देवें | इस तरह ३० पुट तक मैनसिल मिलावें,१० पुटों के पश्चात अग्नि थोडी-थोडी बढातें जायें | यह हल्के मधुमेह शुक्रस्त्राव श्वेत प्रदर और उरःक्षत में विशेष व्यवह्नत होती है |

चतुर्थ विधि –

अगस्तिया अगस्त के २ सेर पत्तो को कल्ककर आध सेर षुध्द सीसे के पतरे पर लेप करके सुखावें फिर कडाही में डालकर तीव्राग्नि देवें |

द्रव होने पर वासा क्षार और अपामार्ग क्षार ५-५ तोले अलग बर्तन मंे मिला उसमें थोडा-थोडा डालते जायें, और अडूसे के डन्डे से चलाते रहें ३-४ घन्टांे तक घोटने पर सीसे की भस्म हो जाती है | फिर उस पर तवा ढक्कर ३ घन्टे और तेज अग्नि देवें | स्वांग शीतल होने पर भस्म को निकाल कपडछन करें, फिर अडुसे के स्वरस में ३ दिन खरलकर टिकीया बना सूर्य के ताप में सुखा शराव सस्पुट कर २ सेर गोबरी का लघुपुट दें | फिर अडूसे के स्वरस में १-१ दिन खरल कर टिकिया बना ७ पुट यथार्थ मंे २१ पुट देने | से सिन्दुरं के समान लाल रंग की भस्म बन जाती है | अंतिम समय में पूरा गज पुट देना चाहियें |

गुणधर्म –

यह भस्म शक्रमेह मधुमेह श्वेत प्रदर कास श्वास उरःक्षत शुल और गुल्म आदि रोगो में हितावह है |

वत्कव्य –

नाग भस्म का गुणधर्म- विवेचन रसतन्त्रसार व सिध्दप्रयोगसंग्रह प्रथम खण्ड में आयुर्वेदिक दृष्टी से विस्तार पूर्वक दिया है | इसके अतिरीक्त सीसा धातु के गुणधर्म आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टी से यहांॅ पर दिये गये है, जिसे जान लेने पर उसका कभी दुरुपयोग न हो सकेंगा |

सीसा अति घातक धातू है, इसकी भस्म अर्ध पक्व होने, या योग्य न बनने पर विविध प्रकार के विष लक्षण उत्पन्न करती है, परिपक्व भस्म का भी अति योग होने, पर या दुरुपयोग होने पर कुछ अंष में अहितकर सिध्द हुई है | अतः सीसा मुर्दासन्ंग नाग-शर्करा अदि के सम्बन्ध मंे पाश्चात्य मतानुसार गुणधर्म का विवेचन किया जाता है | अधिक पुट देने पर भस्म बिल्कुल निर्दोष और उत्तम गुणप्रद बन जाती है | अतः कम पुट वाली भस्म में से दोष पूर्णाेश में दूर नही हो सकेंगा |

सीसा धातू उदर में जाने पर प्रारम्भ में कुछ भी क्रिया नहीं दर्षाता तथापि आमाशय और अन्त्रके व्दिविध है | पहलीस्थानिक संकोचन और अधिक मात्रा में प्रयोग करने, पर उग्रता उत्पादन दुसरी शोषण होने पर व्यापक क्रिया दोनों क्रियांये परस्पर विरुध्द है | कारण स्थानिक उग्रता इतना उपस्थित होती है, कि उस स्थान  की शोषन -षक्ती का हास होता है | इसलिए  व्यापक क्रिया प्रकाषनार्थ नागभस्म या नाग घटित औषध का प्रयोग करना हो तो मात्रा बहुत कम देनी चाहिये जिससे स्थानिक उग्रता उत्पन्न न हो. |

सीसघटित औषध की व्यापक क्रिया संकोचक और अवसादक होती है | यह अवसादक क्रिया रक्त संचालन यन्त्र मंे और विशेषतः वात संस्थान मंे प्रकट होती है | एक ही समय मंे अत्याधिक मात्रा मंे कच्चा सीसा सेवन करने पर वमन और उग्र विष-क्रिया के लक्षण उपस्थित होते है | आमाशय और अन्त्र में इसकी रासायनिक क्रिया प्रकट होती है | अर्थात इसके व्दारा आमाशय और अन्त्र रस के निःसारण का हास होता है | शेष सब रक्तप्रणालियां आकुंचित होती, है अन्त्र की पुःसरण क्रिया प्रतिरुध्द होती है | फिर  सीसा और अन्त्र-रस का समिश्रण होने पर इसका परिवर्तन  एल्ब्युमिन मिश्रण  के रुप में हो जाता है | उसका रक्त में शोषन होकर देह के विविध विभागांे में प्रधानतः संस्थान के केन्द्र विभाग में जाकर संग्रहीत होता है | फिर वह देह से शनै बाहर निकलता है यदि कच्चा सीसा अल्प मात्रा में दिर्घकाल तक सेवन कराया जाये, तो भी उसका भीतर संग्रह होने पर विषक्रिया दर्शाता है |

सुचना –

सीसा सेवन होने पर वृक्को व्दारा रक्त में से क्षार यूरेटस का प्रभेद नही | होता इस हेतु से सीसें के सेवन से पेशाब में यूरिक एसिड की मात्रा कम होती है | और रक्त सेवन दीर्घकाल पर्यन्त नही, करना चाहिए एवं वृक्त रोग पीडितों को भी नहीं कराना चाहिये, एलोपैथिक मत के अनुसार वृध्दों को सीसा सेवन कम से कम करना चाहिये |

स्वस्थावस्था में डाॅक्टरी सीसा घटीत औषध का सेवन अल्प मात्रा में कुछ दिनांे क करने पर स्त्रावण क्रिया का ह्नास धमनी की पुष्टि और गति में लघुता तथा शारीरिक उष्णता का ह्नास होता है | अतियोग होने पर विष क्रिया उपस्थित होती है जब उवयव शिथिल हुए हों धमनी की दीवार प्रसारीत हो गई है | विविध अवयवों का प्रकोप होकर स्त्राव बढ गया हो तब सीसा प्रयुक्त होता है|

 

 

 

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